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अधिप्राप्ति : एक भूमिका

 अधिप्राप्ति : एक भूमिका


    खाद्यान्न की अधिप्राप्ति के लिए सरकार की नीति का मुख्य उद्‌देश्य किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य सनिश्चित कराना और इसके साथ-साथ समाज के कमजोर वर्ग को किफायती मूल्यों पर खाद्यान्न की उपलब्धता भी सनिश्चित करना है। इस प्रकार प्रभावशाली/बाजार हस्तक्षेप से मूल्य नियंत्रिात रहते हैं जिससे देश की समग्र खाद्य सरक्षा में अभिवृति होती है।

    भारतीय खाद्य निगम, भारत सरकार की केन्द्रीय एजेन्सी है, जो कि अन्य राज्य एजेन्सियों के साथ मिलकर मूल्य समर्थन योजना के अधीन गेहॅूं, धान तथा मोटे अनाज की अधिप्राप्ति करता है तथा सांविधिक लेवी योजना के अधीन चावल की अधिप्राप्ति करता है। मूल्य समर्थन के अंतर्गत अधिप्राप्ति मख्यतः किसानों को उनकी फसल का लाभकारी मूल्य सनिश्चित करने के लिए की जाती है ताकि वे बेहतर फसल उत्पादन के लिए प्रोत्साहित हो सकें।

       प्रत्येक रबी/खरीपफ फसल मौसम के दौरान, फसल की कटाई से पूर्व, कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर, भारत सरकार अधिप्राप्ति के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा करती है जो कि अन्य घटकों के साथ-साथ विभिन्न कृषि निवेश की लागत तथा किसानों को उनकी फसल का यथोचित मार्जिन देने पर भी विचार करती है।

       खाद्यान्न अधिप्राप्ति को सगम बनाने के लिए, भा.खा.नि. तथा अन्य राज्य एजेन्सियां राज्य सरकार के परामर्श से विभिन्न मण्डियों तथा प्रमख केन्द्रों पर बड़ी संख्या में खरीद केन्द्र स्थापित करती हैं। केन्द्रों की संख्या तथा उनके स्थान निर्धारण का निर्णय विभिन्न मानदण्डों के आधार पर राज्य सरकारों द्वारा लिया जाता है ताकि न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रचालनों को अधिकतम स्तर तक बढाया जा सके। उदाहरण के लिए गेहॅूं तथा चावल की अधिप्राप्ति के लिए, वर्ष २००९-१० के दौरान प्रत्येक पफसल के लिए १४००० अधिप्राप्ति केन्द्र संचालित किए जाएं। इस प्रकार के व्यापक तथा प्रभावशाली मूल्य समर्थन प्रचालनों के परिणामस्वरूप समय के साथ-साथ किसानों की आय में वृद्धि हुई है तथा उन्नत पैदावार के लिए कृषि क्षेत्र में उच्च निवेश को प्रोत्साहन भी मिला है।

      भारत सरकार के विनिर्देशनों के अधीन आने वाले सभी प्रकार के भण्डार जो खरीद केन्द्रों पर लाए जाते हैं वे नियत समर्थन मूल्य पर खरीद लिए जाते हैं। यदि किसानों को अन्य खरीददारों जैसे कि व्यापारियों/मिलर्स आदि से समर्थन मूल्य से बेहतर कीमत प्राप्त होती हैं तो वे अपनी फसल उन्हें बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। भा.खा.नि. तथा राज्य सरकार/उसकी एजेन्सियां यह सनिश्चित करती हैं कि किसानों को अपनी फसल समर्थन मूल्य से कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर ना होना पड़े।


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